श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा पर नतमस्तक चीनी विद्वान
- गीता को बताया – “ज्ञान का अमृत”
- “भारतीय सभ्यता का लघु इतिहास” पर सहमति
- भारतीय संस्कृति के गहन अध्ययन का आग्रह
भारतीय संस्कृति और दर्शन की गहराई को दर्शाने वाली श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा ने अब चीन के विद्वानों को भी प्रभावित किया है। बीजिंग में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित संगोष्ठी में कई प्रसिद्ध चीनी विद्वानों ने भाग लिया और गीता को “ज्ञान का अमृत” तथा “भारतीय सभ्यता का लघु इतिहास” बताया।
उन्होंने कहा कि गीता न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह आधुनिक युग की मानसिक, सामाजिक और नैतिक चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती है।
गीता को बताया ज्ञान का अमृत
कार्यक्रम में वक्ताओं ने श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा को मानवता के लिए एक मार्गदर्शक बताया। उनका कहना था कि 5,000 वर्ष पहले रचित यह ग्रंथ आज भी जीवन की जटिलताओं का उत्तर देता है।
झेजियांग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वांग झी-चेंग ने कहा कि गीता के 700 श्लोक “आध्यात्मिक कुंजियां” हैं, जो हर युग में मानवता को दिशा दिखाते हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के कर्मयोग, सांख्ययोग और भक्ति योग के सिद्धांतों को जीवन की समस्याओं का समाधान बताया।
प्रोफेसर झांग बाओशेंग ने किया चीनी अनुवाद
88 वर्षीय वरिष्ठ विद्वान प्रोफेसर झांग बाओशेंग, जिन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का चीनी अनुवाद किया है, ने इसे “आध्यात्मिक महाकाव्य” बताया। उन्होंने कहा कि यह ग्रंथ भारत के आध्यात्मिक दृष्टिकोण – कर्तव्य, कर्म और वैराग्य – को उजागर करता है।
झांग ने भारत यात्रा (1984–86) के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कन्याकुमारी से गोरखपुर तक उन्होंने श्रीकृष्ण की उपस्थिति को महसूस किया। उनके अनुसार, श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा भारतीय मनोविज्ञान, नैतिकता और समाज पर आज भी गहराई से प्रभाव डालती है।
गीता को बताया भारतीय सभ्यता का लघु इतिहास
झांग बाओशेंग ने कहा कि गीता भारतीय सभ्यता का “लघु इतिहास” है, जिसमें भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति का सार निहित है। उन्होंने बताया कि इस ग्रंथ का अनुवाद अब दुनिया की लगभग हर प्रमुख भाषा में हो चुका है, जो इसकी वैश्विक लोकप्रियता को दर्शाता है।
भारतीय संस्कृति के अध्ययन का आग्रह
शेन्ज़ेन यूनिवर्सिटी के भारतीय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफेसर यू लोंग्यु ने कहा कि भारत के पास एक विशाल सांस्कृतिक और दार्शनिक विरासत है। उन्होंने चीनी विद्वानों से आग्रह किया कि वे समर्पण के साथ भारतीय संस्कृति और श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा का अध्ययन करें।
उन्होंने कहा, “भारत और चीन दोनों प्राचीन सभ्यताएँ हैं। अगर हम परस्पर अध्ययन करें, तो यह एशिया ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की शांति और सद्भाव के लिए लाभकारी होगा।”
भारतीय राजदूत ने बताया ज्ञान और सद्भाव का संगम
कार्यक्रम में भारतीय राजदूत प्रदीप कुमार रावत ने कहा कि यह संगोष्ठी “रामायण सम्मेलन” का विस्तार है। उन्होंने कहा कि भारत की दार्शनिक परंपराएँ – न्याय, योग, वेदांत और बौद्ध विचार – सभी श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा से प्रेरित हैं।
राजदूत रावत ने कहा, “गीता हमें यह सिखाती है कि सत्य, ज्ञान और कर्म मिलकर ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह ग्रंथ मानवता को एकता और आत्मज्ञान की दिशा में ले जाता है।”

