डिजिटल डेस्क, Suryoday Samachar। पिछले एक दशक में Subsidised Food Canteens भारत के शहरी गरीबों के लिए राहत की बड़ी पहल बनकर उभरीं। इन योजनाओं का मकसद साफ था—दिहाड़ी मजदूरों, प्रवासी कामगारों और जरूरतमंद लोगों को बेहद कम कीमत पर पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना। इस मॉडल की शुरुआत तमिलनाडु की Amma Canteen से हुई, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। इसके बाद कर्नाटक, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने भी Subsidised Food Canteens की शुरुआत की।

हालांकि, समय के साथ ज्यादातर योजनाएं या तो बंद हो गईं या सीमित दायरे में सिमट गईं। इसकी सबसे बड़ी वजह बढ़ती खाद्य महंगाई रही, जिससे राज्यों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ा। इसके अलावा, भुगतान में देरी, कमजोर मॉनिटरिंग और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं ने भी इन योजनाओं को नुकसान पहुंचाया। राजनीतिक बदलाव भी एक अहम कारण बने। सरकार बदलते ही कई राज्यों में Subsidised Food Canteens को पुरानी सरकार की योजना बताकर बंद कर दिया गया।

इन सबके बीच राजस्थान की Annapurna Rasoi एक अपवाद के रूप में सामने आई। नाम बदला, लेकिन योजना जारी रही। यह दिखाता है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो कल्याणकारी योजनाएं लंबे समय तक चल सकती हैं। आज भी यह बहस जारी है कि Subsidised Food Canteens को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत ढांचे के साथ लागू किया जाए या नहीं।

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FAQ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. Food Canteens का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इनका उद्देश्य शहरी गरीबों को सस्ता और पौष्टिक पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना है।

Q2. ज्यादातर Food Canteens क्यों बंद हो गईं?
बढ़ती लागत, प्रशासनिक कमजोरी और राजनीतिक बदलाव इसके मुख्य कारण रहे।

Q3. कौन-सी योजना आज भी सफल मानी जाती है?
राजस्थान की अन्नपूर्णा रसोई योजना को निरंतरता के कारण सफल माना जाता है।

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