राष्ट्रपति मुर्मु यशोदा मेडिसिटी के उद्घाटन समारोह में बोलीं – स्वास्थ्य सेवाएं आत्मनिर्भर भारत की पहचान
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुरुग्राम में यशोदा मेडिसिटी का उद्घाटन किया।
- स्वास्थ्य सेवाएं अब आत्मनिर्भर भारत की पहचान—राष्ट्रपति मुर्मु।
- राउज एवेन्यू कोर्ट ने आवास ऋण अनियमितता केस में छह आरोपी बरी किए।
नई दिल्ली। देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुरुग्राम में यशोदा मेडिसिटी का भव्य उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत की स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से सुधार हो रहा है और यह “आत्मनिर्भर भारत” की सशक्त पहचान बन चुकी हैं।
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि देश में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार से आम नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा मिल रही है। उन्होंने इस दौरान चिकित्सा क्षेत्र में नवाचार और पारदर्शिता पर विशेष बल दिया।
यशोदा मेडिसिटी: आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का नया केंद्र
गुरुग्राम में स्थापित यशोदा मेडिसिटी को उत्तर भारत के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पतालों में शामिल किया जा रहा है। अस्पताल में अत्याधुनिक तकनीक से लैस चिकित्सा उपकरण, रोबोटिक सर्जरी, इमरजेंसी ट्रॉमा केयर, और ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सुविधाएं मौजूद हैं।
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि यह मेडिसिटी न केवल भारत के लिए बल्कि दक्षिण एशिया के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बनेगी। उन्होंने इस अवसर पर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सराहना की जो देश को स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में अग्रसर कर रहे हैं।
आवास ऋण मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट का बड़ा फैसला
उधर, राउज एवेन्यू कोर्ट ने दो दशक पुराने आवास ऋण अनियमितता मामले में छह आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष सभी आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
विशेष न्यायाधीश ज्योति क्लेर की अदालत ने राजन अरोड़ा, सुनीता अरोड़ा, विनय कुमार गोयल, वैभवी गोयल, अरविंद गोयल और भूषण देव चावला को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। अरविंद गोयल और चावला की मृत्यु के कारण पहले ही उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी।
CBI के आरोप और अदालत का अवलोकन
इस मामले में CBI ने जून 2004 में प्राथमिकी दर्ज की थी। आरोप था कि इलाहाबाद बैंक के पूर्व अधिकारी वी.के. छिब्बर ने निजी व्यक्तियों के साथ मिलकर जाली संपत्ति दस्तावेजों के आधार पर आवास ऋण स्वीकृत किए थे।
सीबीआई के अनुसार, इससे बैंक को लगभग 77.6 लाख रुपये का नुकसान हुआ था। ये ऋण वर्ष 2003 में दिल्ली के शालीमार गांव और ओल्ड गोबिंदपुरा की संपत्तियों के लिए स्वीकृत किए गए थे।
हालांकि अदालत ने कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं। न्यायाधीश ने कहा कि समान साक्ष्यों के आधार पर सह-आरोपितों को पहले ही 2021 में बरी किया जा चुका है, इसलिए अब अलग निर्णय का कोई औचित्य नहीं बनता।
सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी
अदालत ने यह भी माना कि जांच एजेंसियां आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी के आरोपों को साबित करने में नाकाम रहीं। इस कारण सभी आरोपियों को “संदेह का लाभ” देते हुए बरी कर दिया गया।
यह फैसला उन मामलों में से एक है जहां अदालत ने जांच की निष्पक्षता और साक्ष्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
आत्मनिर्भर भारत में स्वास्थ्य और न्याय – दो मजबूत स्तंभ
एक ओर जहां राष्ट्रपति मुर्मु ने स्वास्थ्य सेवाओं को आत्मनिर्भर भारत की पहचान बताया, वहीं अदालत के इस फैसले ने न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता को भी रेखांकित किया।
दोनों घटनाओं ने इस बात को साबित किया है कि भारत में संस्थान – चाहे स्वास्थ्य हों या न्यायपालिका – निरंतर सशक्त और पारदर्शी होते जा रहे हैं।

