अक्सर माना जाता है कि मोबाइल, लैपटॉप या टीवी से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद की दुश्मन है। यह धारणा आंशिक रूप से सही है, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं।

  • 2013 की एक स्टडी में पाया गया कि दो घंटे तक पूरी ब्राइटनेस पर iPad इस्तेमाल करने से नींद पर हल्का असर पड़ा, जबकि एक घंटे के इस्तेमाल से खास फर्क नहीं पड़ा।
  • 2014 के रिसर्च के मुताबिक, लगभग 9 फीट की दूरी से टीवी देखने पर मेलाटोनिन (sleep hormone) पर कोई असर नहीं हुआ।
  • 2018 की एक स्टडी ने साफ किया कि स्क्रीन की ब्राइटनेस सबसे बड़ा फैक्टर है – ज्यादा ब्राइटनेस असर बढ़ाती है, जबकि नाइट मोड और डिम स्क्रीन असर घटा सकती हैं।

दिन में धूप क्यों है जरूरी?

एक और दिलचस्प बात यह है कि दिन में जितनी ज्यादा प्राकृतिक धूप मिलेगी, शाम को स्क्रीन लाइट का असर उतना ही कम होगा।
यानि नींद पर स्क्रीन का असर सभी के लिए एक जैसा नहीं होता। किसी को मामूली रोशनी भी जगाए रख सकती है, जबकि किसी पर जोरदार एक्शन फिल्म का भी असर नहीं होता।

तो असली वजह क्या है?

रिसर्च अब मान रही है कि नींद खराब करने में स्क्रीन की रोशनी से ज्यादा भूमिका स्क्रीन पर की जाने वाली एक्टिविटी की है।

  • सोशल मीडिया स्क्रॉल करना
  • एक्शन-पैक्ड गेम खेलना
  • ऑनलाइन शॉपिंग
  • लगातार न्यूज़ पढ़ना

ये सब दिमाग के रिवार्ड सिस्टम को एक्टिव कर देते हैं। इससे डोपामाइन रिलीज़ होता है, जो दिमाग को ज्यादा अलर्ट और एक्साइटेड बना देता है।

2024 की एक स्टडी ने पाया:

  • जो लोग सोने से पहले गेम्स खेलते या चैटिंग करते, उनकी नींद की अवधि कम हो गई।
  • जबकि जो सिर्फ टीवी या फिल्म देख रहे थे, उनकी नींद पर खास असर नहीं पड़ा।

क्या स्क्रीन कभी मदद कर सकती है?

जी हां ✅
अगर किसी का दिमाग चिंता या नेगेटिव विचारों से भरा हो, तो स्क्रीन एक डिस्ट्रैक्शन टूल का काम कर सकती है।

  • हल्का-फुल्का कॉमेडी शो
  • कोई पुरानी, जानी-पहचानी आरामदायक फिल्म

ये दिमाग को रिलैक्स कर सकती हैं और नींद आने में मदद कर सकती हैं।

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