डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि हर वादाखिलाफी को शादी का झूठा वादा नहीं कहा जा सकता। अदालत ने दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि झूठे वादे और वादाखिलाफी में बड़ा अंतर है। यदि किसी व्यक्ति ने शुरुआत से ही धोखा देने के इरादे से शादी का वादा किया हो, तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन अगर परिस्थितियों के कारण विवाह संभव नहीं हो सका, तो इसे झूठा वादा नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून को सहमति से बने रिश्तों में खटास आने पर बदले के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी जोड़ा कि ऐसे मामलों में सच्चाई व्यक्ति के इरादे पर निर्भर करती है। यदि संबंध आपसी सहमति से बने हैं, तो बाद में मतभेद होने पर इसे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता।

यह निर्णय समाज के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिससे झूठे मामलों से निर्दोषों की रक्षा हो सके और वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिले।


🔍 FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न 1. क्या हर वादाखिलाफी शादी का झूठा वादा मानी जाती है?
नहीं, यह आरोपी के इरादे पर निर्भर करता है कि उसने वादा ईमानदारी से किया या धोखे से।

प्रश्न 2. कब माना जाएगा कि शादी का झूठा वादा किया गया?
जब आरोपी का शुरू से ही शादी का इरादा न हो और उसने केवल शारीरिक संबंध के लिए धोखा दिया हो।

प्रश्न 3. क्या सहमति से बने रिश्ते में मतभेद दुष्कर्म कहलाता है?
नहीं, अदालत के अनुसार सहमति से बने रिश्तों में मतभेद को अपराध नहीं कहा जा सकता।

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