“25 जून 2025 को भारत में लगे आपातकाल (इमरजेंसी) की 50वीं वर्षगांठ है। इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया। पार्टी के कई शीर्ष नेताओं ने इस मौके पर कांग्रेस और उस दौर की नीतियों को लेकर तीखे बयान दिए।“
एस. जयशंकर का बयान: इमरजेंसी भारतीय इतिहास का दर्दनाक अध्याय
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा:
“संविधान हत्या दिवस पर हम उस अध्याय को याद करते हैं, जब संस्थाओं को कमजोर किया गया, अधिकारों को निलंबित कर दिया गया और जवाबदेही दरकिनार कर दी गई। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करें और लोकतंत्र की मजबूती बनाए रखें।”
उनके इस बयान को कांग्रेस पर सीधा हमला माना गया, खासकर यह कहते हुए कि इमरजेंसी भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर सबसे बड़ा आघात था।
राजनाथ सिंह: लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश हुई थी
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इमरजेंसी की 50वीं वर्षगांठ पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा:
“आज से पचास साल पहले लोकतंत्र का गला घोंटने का कुत्सित प्रयास हुआ था। संविधान को दरकिनार करते हुए आपातकाल थोपा गया। विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया और हर संवैधानिक संस्था का दुरुपयोग किया गया।”
उन्होंने इमरजेंसी के खिलाफ संघर्ष करने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि आज का लोकतंत्र उनकी तपस्या और बलिदान का परिणाम है।
अमित शाह: इमरजेंसी सत्ता की भूख का अन्यायकाल था
गृह मंत्री अमित शाह ने इमरजेंसी को “अन्यायकाल” की संज्ञा दी और कहा:
“25 जून 1975 को कांग्रेस ने सत्ता की भूख में लोकतंत्र को कुचल डाला। प्रेस की आज़ादी छीनी गई, न्यायपालिका पर अंकुश लगाया गया, सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाला गया।”
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी उस दौर की सच्चाई जान सके।
अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाएं
विष्णु देव साय (मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़):
“25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल लोकतंत्र का उल्लंघन था। गांधी परिवार ने संविधान को ताक पर रख दिया। भाजपा इस दिन को काला दिवस के रूप में मनाती है।”
उन्होंने राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि उनकी राजनीति को अब कोई गंभीरता से नहीं लेता।
अनिल बलूनी (भाजपा सांसद):
“50 साल पहले विपक्ष की आवाज को कुचला गया, अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई। सिर्फ सत्ता के लिए लोकतंत्र का गला घोंटा गया।”
इमरजेंसी 1975: संक्षिप्त पृष्ठभूमि
- 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया
- इसका कारण आंतरिक अस्थिरता बताया गया, लेकिन विपक्ष इसे सत्ता बचाने की रणनीति मानता है
- लगभग 21 महीने तक देश संविधान की सामान्य प्रक्रिया से बाहर रहा
- हजारों विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना सुनवाई के जेल में डाला गया
- प्रेस की स्वतंत्रता पर पूर्ण सेंसरशिप लगाई गई
- न्यायपालिका और संस्थानों की स्वतंत्रता में भारी हस्तक्षेप किया गया
भाजपा का संदेश: नई पीढ़ी को जानना चाहिए सच्चाई
भाजपा ने इस दिन को राजनीतिक स्मरण के साथ-साथ एक जन-जागरूकता अभियान में भी बदल दिया है। नेताओं के अनुसार, यह जरूरी है कि युवाओं को बताया जाए कि लोकतंत्र की रक्षा कितनी महत्वपूर्ण है और क्या होता है जब सत्ता का दुरुपयोग होता है।
इमरजेंसी की 50वीं वर्षगांठ पर भाजपा द्वारा मनाया गया ‘संविधान हत्या दिवस’ सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्यों की रक्षा का संकल्प है। इस दिन का स्मरण भारत के हर नागरिक को यह याद दिलाता है कि संविधान की आत्मा को कमजोर नहीं किया जा सकता – जब तक जनता जागरूक और संगठित है।

