भारत में घरेलू क्रेडिट वित्त वर्ष 2024 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 42.1 प्रतिशत हो गया है, जो वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2020 तक 32 से 35 प्रतिशत के बीच स्थिर था। यह जानकारी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की मार्केट पल्स रिपोर्ट में दी गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, यह वृद्धि महामारी के बाद परिवारों के क्रेडिट में हुई मजबूत वृद्धि को दर्शाती है, जो वित्तीय पहुंच और आत्मविश्वास में वृद्धि को साबित करती है।

महामारी के बाद बढ़ा घरेलू क्रेडिट

कोविड-19 महामारी के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने काफी सकारात्मक सुधार देखा है, जिसमें घरेलू क्रेडिट में तेजी से वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2021 में घरेलू क्रेडिट ने 39.9 प्रतिशत का आंकड़ा छुआ, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह बढ़कर 42.1 प्रतिशत हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह वृद्धि महामारी के बाद आई है, जब फाइनेंशियल सेक्टर में परिवारों के लिए उधारी और वित्तीय पहुंच बढ़ी, जिससे लोगों ने अधिक लोन और क्रेडिट का उपयोग किया।

वित्तीय बचत में कमी और देनदारियों में वृद्धि

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि शुद्ध घरेलू वित्तीय बचत महामारी के कारण वित्त वर्ष 2021 में बहुत अधिक बढ़ गई थी, लेकिन अब यह धीरे-धीरे सामान्य हो गई है। वित्त वर्ष 2024 में बचत सकल घरेलू उत्पाद के 5.2 प्रतिशत पर पहुंच गई।

रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय देनदारियों में तीव्र वृद्धि देखी गई है। महामारी के दौरान लोगों ने अपनी बचत में वृद्धि की थी, लेकिन वित्तीय देनदारियां महामारी के बाद में तेजी से बढ़ी हैं। वित्त वर्ष 2021 में 7.4 लाख करोड़ रुपए की देनदारियां वित्त वर्ष 2024 तक बढ़कर 18.8 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई हैं। इस वृद्धि का असर शुद्ध वित्तीय बचत पर पड़ा है, जो वित्त वर्ष 2021 में 23.3 लाख करोड़ रुपए के शिखर से घटकर वित्त वर्ष 2024 में 15.5 लाख करोड़ रुपए हो गया है।

उपभोग वृद्धि और घरेलू लोन की भूमिका

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि घरेलू क्रेडिट में वृद्धि के चलते उपभोग में भी सुधार हुआ है। उपभोग में वृद्धि का एक प्रमुख कारण घरेलू लोन में वृद्धि है, जो वित्त वर्ष 2023-2025 के दौरान औसतन 6.7 प्रतिशत की वृद्धि दिखा रही है। इस वृद्धि से निजी उपभोग में एक सकारात्मक बदलाव आया है और भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती आई है।

एनएसई मार्केट पल्स रिपोर्ट के अनुसार, उपभोग में वृद्धि और घरेलू लोन के बढ़ने से भारतीय बाजार में आर्थिक गतिविधियों का स्तर भी बढ़ा है, जिससे व्यापार और वित्तीय साक्षात्कार में सुधार हुआ है।

बचत और उधारी में बदलाव: क्या इसका अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा?

महामारी के कारण पहले सावधानी और खर्च पर नियंत्रण ने वित्तीय बचत को बढ़ाया था, लेकिन अब उधारी और वित्तीय देनदारियों में हुई वृद्धि ने बचत को कम कर दिया है। हालांकि, यह वृद्धि अर्थव्यवस्था में एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि इसका मतलब यह है कि लोग अब अधिक वित्तीय उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं और उनकी आर्थिक सक्रियता बढ़ रही है।

भारत के आर्थिक सुधार के संकेत

रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में घरेलू क्रेडिट के बढ़ने और वित्तीय देनदारियों में वृद्धि से यह संकेत मिलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने महामारी के बाद स्थिरता की ओर कदम बढ़ाया है। अब जबकि उपभोग में वृद्धि और वित्तीय सुधार हो रहे हैं, भारत को आर्थिक दृष्टिकोण से मजबूत और स्थिर माना जा रहा है।

इसके अलावा, घरेलू लोन की वृद्धि ने भारतीय उपभोक्ताओं के विश्वास को और मजबूत किया है, और निवेश के अवसरों में भी वृद्धि की संभावना है।

भारत की घरेलू क्रेडिट स्थिति में आयी यह वृद्धि एक सकारात्मक संकेत है। महामारी के बाद भारत ने फाइनेंशियल सेक्टर में कई सुधार किए हैं, जिनकी वजह से वित्तीय देनदारियां और उपभोग दोनों में वृद्धि हुई है। इस स्थिति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनः मजबूत किया है और आने वाले वर्षों में नवीनतम निवेश और वित्तीय अवसरों की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार किया है।

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