भारत में सामुदायिक जीवन की भावना आज भी कई गांवों में जीवित है। गुजरात सामुदायिक रसोई इसकी एक बेहतरीन मिसाल है, जहां लोग अपने घरों में खाना नहीं बनाते, फिर भी पूरे गांव को रोज़ पौष्टिक भोजन मिलता है।
गुजरात के चंदाकी गांव में समय के साथ बड़ी संख्या में युवा शहरों की ओर चले गए। गांव में अधिकतर बुजुर्ग ही रह गए। अकेलेपन और नियमित भोजन की कमी एक बड़ी समस्या बन गई। इसी चुनौती से निपटने के लिए गुजरात सामुदायिक रसोई योजना की शुरुआत की गई।
इस पहल के तहत गांव में एक केंद्रीय रसोई बनाई गई। गांव के लोग हर महीने मामूली राशि का योगदान करते हैं। इसके बदले सभी को रोज़ दो वक्त ताज़ा और संतुलित गुजराती भोजन मिलता है। भोजन में दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी और पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं।
यह रसोई सिर्फ खाने की व्यवस्था नहीं है। यह बुजुर्गों के लिए मिलने-जुलने और बातचीत का भी केंद्र बन गई है। नियमित भोजन से उनकी सेहत में सुधार हुआ है और मानसिक तनाव भी कम हुआ है।
Suryoday Samachar | Durgesh Shrma के अनुसार, गुजरात सामुदायिक रसोई ने यह साबित कर दिया है कि सहयोग और संवेदनशीलता से समाज की बड़ी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। आज यह मॉडल आसपास के कई गांवों के लिए प्रेरणा बन चुका है।
FAQ (Hindi)
प्रश्न 1: गुजरात सामुदायिक रसोई योजना क्या है?
उत्तर: यह एक सामूहिक भोजन व्यवस्था है, जिसमें गांव के सभी लोगों को रोज़ पौष्टिक भोजन मिलता है।
प्रश्न 2: इस योजना का सबसे अधिक लाभ किसे मिलता है?
उत्तर: बुजुर्गों और अकेले रहने वाले लोगों को।
प्रश्न 3: क्या यह मॉडल अन्य गांवों में लागू हो सकता है?
उत्तर: हां, यह कम खर्च में लागू किया जा सकने वाला मॉडल है।

