“ जून 2025 में बिजली की मांग में 1.9% की गिरावट देखी गई, जो कि लगातार दूसरा महीना है जब बिजली की मांग में कमी आई है। इसके कारण सामान्य से अधिक मानसूनी वर्षा और देश के अधिकांश हिस्सों में कम तापमान को माना जा रहा है। यह जानकारी क्रिसिल द्वारा बुधवार को जारी की गई अपनी रिपोर्ट में दी गई है।“
मानसून की अधिक वर्षा और तापमान में गिरावट
1 से 25 जून के बीच भारत में लंबी अवधि के औसत की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई। पिछले मानसून में इसी अवधि में वर्षा में 11 प्रतिशत की कमी थी। इस वर्ष का मानसून पहले के मुकाबले अधिक सशक्त दिखाई दिया है, जिससे तापमान में गिरावट आई और बिजली की मांग में कमी आई। यह बारिश ने न केवल जलवायु में सुधार किया, बल्कि कृषि क्षेत्र और उपभोग पर भी सकारात्मक प्रभाव डाला।
उत्पादन में कमी और बाजार मूल्य
बिजली उत्पादन भी मांग की कमी के कारण 0.8% घटकर 161 बीयू हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, रियल-टाइम मार्केट (आरटीएम) में एवरेज मार्केट क्लियरिंग प्राइस (एमसीपी) जून में 26 प्रतिशत घटकर 3.73 रुपये प्रति यूनिट रह गया। यह गिरावट बिजली की कम जरूरत और अच्छी उपलब्धता को दर्शाती है।
बिजली की मांग में क्षेत्रीय बदलाव
- उत्तर भारत में बिजली की मांग में 5% की कमी आई, जबकि पिछले साल इस क्षेत्र में 23% की वृद्धि देखी गई थी।
- उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में वर्षा 37% अधिक थी, जो इस क्षेत्र में मौसम के बदलाव और वर्षा में वृद्धि को दर्शाता है।
- दक्षिणी क्षेत्र में बिजली की मांग में 5.3% की वृद्धि हुई, जो कि इस क्षेत्र में 5% कम वर्षा से जुड़ी थी।
कोयला भंडार का उच्चतम स्तर और बिजली उत्पादन में समर्थन
भारत में कोयला अभी भी बिजली उत्पादन का मुख्य ईंधन बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून तक ताप विद्युत संयंत्रों के पास 62 मिलियन टन (एमटी) कोयला का भंडार था, जो अप्रैल 2021 के बाद का उच्चतम स्तर है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि बिजली उत्पादन में कम नहीं हुआ, बल्कि वित्तीय वर्ष 2025 की शुरुआत में कोयला भंडार अच्छा रहा, जिससे भविष्य में बिजली उत्पादन में रुकावट आने की संभावना कम रही।
घरेलू उपभोग और बाजार धारणा
हालांकि बिजली की कम मांग और मौसम में सुधार के कारण कुछ क्षेत्रों में नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लेकिन घरेलू उपभोग और संरचनात्मक विकास पर निवेशकों का ध्यान बना हुआ है। खासकर एफएमसीजी कंपनियों ने अच्छे परिणाम दिए हैं, जिससे ग्रामीण मांग और मुद्रास्फीति में कमी के संकेत मिल रहे हैं।
विनोद नायर, रिसर्च हेड, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड ने कहा कि, “भारत के प्रमुख सूचकांक सीमित दायरे में रहे हैं, लेकिन घरेलू उपभोग और संरचनात्मक विकास की दिशा में निवेशकों का ध्यान बढ़ रहा है।”
बिजली की खपत और संरचनात्मक विकास
भारत में बिजली की मांग में कमी के बावजूद संरचनात्मक विकास और आधारभूत ढांचे पर खर्च में वृद्धि हो रही है, जो दीर्घकालिक दृष्टिकोण से भारत के बिजली उद्योग के लिए सकारात्मक हो सकता है। शहरी मांग में संभावित सुधार और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती ऊर्जा खपत से संबंधित संकेत मिल रहे हैं, जो आने वाले समय में बिजली की मांग को बढ़ावा दे सकते हैं।
बिजली की मांग में जून में आई गिरावट एक अस्थायी स्थिति हो सकती है, जो मानसून और मौसम संबंधी बदलावों के कारण हुई है। हालांकि, घरेलू उपभोग, संरचनात्मक विकास, और आधारभूत ढांचे पर खर्च के कारण भारत में बिजली की बिक्री और उत्पादन में वृद्धि के संकेत हैं। इसके अतिरिक्त, कोयला भंडार का उच्चतम स्तर और बिजली उत्पादन में सुधार आने वाले महीनों में संभावित वृद्धि का संकेत देता है।
ऊर्जा उद्योग में आने वाले समय में वृद्धि की संभावना बनी हुई है, क्योंकि वर्षा का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है और आर्थिक विकास के कारण बिजली की मांग बढ़ सकती है।
