भारत का कृषि भविष्य अतीत के अनुभवों में छिपा है। अगर हम अपनी पुरानी खेती की राहें भूल गए, तो अगली पीढ़ियों को उपजाऊ खेत नहीं, बल्कि बंजर जमीन सौंपेंगे। इस बदलाव की सबसे मजबूत कड़ी हैं गांव की महिलाएं, जो खेतों की हरियाली से लेकर समाज की सोच तक को सींच रही हैं।

स्मार्टनेस सिर्फ टेक्नोलॉजी से नहीं

आज ड्रोन, सैटेलाइट इमेज और डेटा एनालिटिक्स की बात होती है, लेकिन असली स्मार्टनेस मिट्टी की गंध पहचानने, बीज की भाषा समझने और हवा के रुख को पढ़ने में है — ये गुण हमें दादी-नानी से मिले हैं, न कि किसी ऐप से।

खेती का बोझ, बदलाव की राह

रासायनिक खेती ने उत्पादन बढ़ाया लेकिन मिट्टी बीमार कर दी। किसान कर्जदार हो गए, और खेत मुनाफे के बजाय बोझ बन गए।
अब प्राकृतिक खेती — जैसे जीवामृत, बीजामृत और देशी गाय के गोबर-गोमूत्र से मिट्टी को पुनर्जीवित करना — किसानों को आत्मनिर्भर और उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन देने का रास्ता दिखा रही है।

महिलाएं: नवाचार की वाहक

  • आंध्र प्रदेश, हिमाचल, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में महिला समूह प्राकृतिक खेती और जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग कर रहे हैं।
  • वे पैकेजिंग, ऑनलाइन बिक्री (अमेज़न, फ्लिपकार्ट, GEM) और सोशल मीडिया मार्केटिंग में सक्रिय हैं।
  • उनके लिए खेती सिर्फ तकनीकी काम नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव है।

मौसम और मिट्टी की भाषा की समझ

महिलाएं अनुभव से जानती हैं कि किस साल कौन सा बीज चलेगा और किस खेत की क्या समस्या है। यह ज्ञान किसी सैटेलाइट से नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव से आता है।

उत्तराखंड का सबक

पहाड़ों की सीढ़ीदार खेती जल प्रबंधन, मिट्टी संरक्षण और प्रकृति के संतुलन का बेहतरीन उदाहरण थी। इसे छोड़कर हमने आपदाओं को न्योता दिया। अब जरूरत है इन पारंपरिक तरीकों को महिला नेतृत्व के साथ पुनर्जीवित करने की।

सरकार और नीति की भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार प्राकृतिक खेती और श्रीअन्न (मोटे अनाज) को अपनाने पर जोर दिया है।
लेकिन नीतियों का असली असर तब होगा जब वे महिला किसानों के अनुभव और नेतृत्व से जुड़ें। अभी भी खेती का 60% कार्यभार महिलाएं निभाती हैं, फिर भी नीतियां पुरुष-केंद्रित हैं।

नवाचार = परंपरा की नई व्याख्या

असली नवाचार मशीन नहीं, बल्कि समस्या का हल है — और कई बार यह हल हमारी पुरानी परंपराओं में मौजूद होता है। प्राकृतिक खेती और महिला नेतृत्व इस ‘साइलेंट इनोवेशन’ का सबसे मजबूत उदाहरण हैं।

अगर भारत को आत्मनिर्भर कृषि चाहिए, तो रसायन और तकनीक के साथ संवेदना, परंपरा और महिला शक्ति को भी अपनाना होगा। महिलाओं के अनुभव को विज्ञान का दर्जा और नीति में स्थान देना जरूरी है।
तभी भारत की धरती फिर से मुस्कुराएगी — हरी, सुरक्षित और आत्मनिर्भर।

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