Justice Siddharth Mridul LPG Agency Case :- दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और मणिपुर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सिद्धार्थ मृदुल को लेकर एक रिपोर्ट सामने आने के बाद न्यायपालिका की आचार संहिता पर बहस तेज हो गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उन्होंने न्यायाधीश के पद पर रहते हुए करीब 16 वर्षों तक एक एलपीजी वितरण एजेंसी का संचालन किया, जिसे न्यायिक नैतिकता और आचार संहिता के विपरीत बताया जा रहा है।
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रिपोर्ट के अनुसार, संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी प्रकार के व्यावसायिक, वित्तीय या सरकारी अनुबंध संबंधी हितों से दूर रहें, ताकि न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का प्रश्नचिह्न न लगे। इसी आधार पर इस मामले ने कानूनी और न्यायिक हलकों में गंभीर चर्चा छेड़ दी है।
बताया गया है कि संबंधित एलपीजी एजेंसी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) से जुड़ी थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि एजेंसी के संबंध में जारी कई नोटिसों का समय पर जवाब नहीं दिया गया। हालांकि, इस मामले में सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं की स्वतंत्र जांच या न्यायिक निष्कर्ष अभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।
सिद्धार्थ मृदुल ने वर्ष 2008 से 2023 तक दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में सेवा दी। इसके बाद उन्हें मणिपुर उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जहां से वे नवंबर 2024 में सेवानिवृत्त हुए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायाधीशों का किसी भी संभावित हितों के टकराव (Conflict of Interest) से दूर रहना बेहद आवश्यक है। यदि ऐसे मामलों में किसी प्रकार की अनियमितता या आचार संहिता के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो यह न्यायिक संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर सकता है। हालांकि, किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना भी उतना ही आवश्यक है।
