सोहराय कला झारखंड की एक अनोखी आदिवासी दीवार चित्रकला है, जो प्रकृति और पशुधन के प्रति सम्मान को दर्शाती है। यह कला मुख्य रूप से हजारीबाग क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है और परंपरागत रूप से दीपावली के अगले दिन बनाई जाती है। मिट्टी से बने प्राकृतिक रंग, बांस की कूची और गांव की दीवारें इसका आधार होती हैं।
इस कला में पेड़, जंगल, मछलियां, पक्षी और पशु प्रमुख विषय होते हैं। सोहराय केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती और पशुधन पर आधारित ग्रामीण जीवन की भावना को भी दर्शाती है। यही वजह है कि इसे फसल उत्सव से जोड़ा जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में कला ने गांवों की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय पहचान बनाई है। GI टैग मिलने के बाद इस कला को नई मजबूती मिली। आज यह दीवारों के साथ-साथ साड़ियों, बैग, पेंटिंग और सजावटी वस्तुओं पर भी दिखाई देती है।
इस कला ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। घर से काम करते हुए महिलाएं अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं और परिवार में सम्मान पा रही हैं। कला अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का साधन बन चुकी है।
— Suryoday Samachar | Durgesh Sharma
FAQ: सोहराय कला से जुड़े सवाल
प्रश्न 1: कला किस राज्य से जुड़ी है?
उत्तर: सोहराय कला मुख्य रूप से झारखंड से जुड़ी है।
प्रश्न 2: कला में किन रंगों का उपयोग होता है?
उत्तर: इसमें लाल, काला, पीला और सफेद जैसे प्राकृतिक मिट्टी के रंग प्रयोग होते हैं।
प्रश्न 3: कला क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: यह कला प्रकृति संरक्षण, पशुधन सम्मान और महिला सशक्तिकरण का संदेश देती है।

