भारतीय कृषि में संतुलित उर्वरकों का उपयोग आज एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। हरित क्रांति के बाद उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन लंबे समय तक एकतरफा उर्वरक प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ा। इसी कारण अब वैज्ञानिक और किसान दोनों संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर ज़ोर दे रहे हैं। संतुलित उर्वरकों का उपयोग का अर्थ है—फसल की वास्तविक आवश्यकता, मिट्टी की उर्वरता और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सभी आवश्यक मैक्रो और माइक्रो पोषक तत्वों का सही अनुपात में प्रयोग। यह केवल नाइट्रोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे तत्वों को भी शामिल करता है।
इस पद्धति से फसलों की उत्पादकता बढ़ती है और पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता में सुधार होता है। साथ ही, मृदा की संरचना बेहतर होती है और जल धारण क्षमता भी बढ़ती है। संतुलित उर्वरकों का उपयोग पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में भी मदद करता है, क्योंकि इससे उर्वरकों का अपवाह और रिसाव घटता है। भारत सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीम-लेपित यूरिया और नैनो उर्वरकों जैसी योजनाओं के माध्यम से इस दिशा में सक्रिय प्रयास कर रही है। ये पहलें किसानों को वैज्ञानिक और लागत-प्रभावी खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
Suryoday Samachar | Durgesh Sharma
FAQ
प्रश्न 1: उपयोग क्यों ज़रूरी है?
यह मृदा स्वास्थ्य बनाए रखता है और फसल की स्थिर उपज सुनिश्चित करता है।
प्रश्न 2: क्या इससे खेती की लागत कम होती है?
हाँ, सही मात्रा में उर्वरक देने से अनावश्यक खर्च कम होता है।

